मुझे गुरुजी के बारे में सितम्बर 2011 के बाद पता चला जब मेरे बेटे के अमरीका के वीज़ा की अर्ज़ी अटकी हुई थी। साल 2011 में मेरे बेटे ने एक बहुत अच्छे कॉलेज से इंजीनियरिंग पूरी की और अमरीका की एक आइ. टी. कम्पनी ने उसे जनवरी में ही नौकरी का प्रस्ताव दे दिया। उसके एच 1 बी वीज़ा का काम शुरू हो गया और अपनी नौकरी को लेकर वह बहुत खुश था।
जाने से 15 दिन पहले, वीज़ा से सम्बंधित उसे कुछ और प्रमाण लाने को कहा गया। उसका सारा उत्साह खत्म हो गया और हम से उसकी परेशानी और दुःख देखे नहीं जा रहे थे।
तभी कुछ मित्रों ने हमें गुरुजी के आश्रम और बड़े मंदिर के बारे में बताया और बृहस्पतिवार के दिन शाम को 4 बजे हम वहाँ पहुँचे। हमें बताया गया था कि संगत हॉल 6 बजे खुलता है इसलिए हमने वहीं प्रतीक्षा की। कुछ ही समय में एक महिला ने हमें लंगर करने के लिए कहा। हमें आश्चर्य हुआ क्योंकि अभी लंगर का समय नहीं हुआ था किन्तु हमने लंगर किया। बाद में जब संगत हॉल खुला तो हम दर्शन करके घर वापस गए। बड़े मंदिर से निकल कर हम शान्ति की अनुभूति हुई। मेरी पत्नी ने संगत में अपनी सहेलियों को बताया कि कैसे हमें समय से पहले लंगर मिल गया था जिस पर वह बोलीं कि हम भाग्यशाली थे कि हमें जल्दी लंगर मिला क्योंकि साधारणतया रात को नौ बजे के बाद ही लंगर शुरू होता है।
अगले दिन से ही हालात सुधरने लगे। मेरे बेटे को जहाँ नौकरी मिली थी, वो लोग और उनके वकील पूरी तरह से उसको वीज़ा दिलाने के काम में जुट गए। उद्योग विशेषज्ञों से हमें चिट्ठी चाहिए थी और कुछ और काम, इतनी आसानी से हो गए कि हमें उम्मीद नज़र आई। हम नियमित रूप से हर सोमवार मंदिर जाते रहे और कभी-कभी हफ्ते में दो बार भी। एक बार हमारा बेटा भी हमारे साथ चला और हमने उसे दोबारा बड़े मंदिर ले जाने का भी सोचा। हम जब भी मंदिर जाते हैं, प्रसाद आवश्य लेते हैं।
बड़े मंदिर जाने के कुछ ही दिनों बाद मेरे बेटे को वीज़ा मिल गया। अमरीका जाने में जो उसके रास्ते में जो भी रुकावटें थीं, वह सब हट गईं थीं। मुझे सच्चे दिल से यह लगता है कि उस कठिन समय में गुरुजी ने हमारा हाथ थामा हुआ था और उन्होंने हमारा मार्गदर्शन किया ताकि हम अपने बेटे के चेहरे पर दोबारा सफलता की मुस्कान देख सकें।
गुरुजी के प्रेम और सहारे के लिए मेरी पत्नी भी गुरुजी का शुक्रिया अदा करती है। हम जीवन भर के लिए गुरुजी के भक्त हो गए हैं।
आशीष भल्ला, एक भक्त
जनवरी 2012