मैंने गुरूजी के सत्संग में नित्य यह सुना और पढ़ा था कि कठिन समय में गुरूजी लोगों की मदद करते हैं। किन्तु यह सभी सत्संग उन संगत के लोगों के थे जो गुरूजी से तब मिले थे जब वह शारीरिक रूप में संगत के समक्ष थे।
मैं गुरूजी से कभी प्रत्यक्ष रूप में मिल नहीं पाया, किन्तु मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि गुरूजी सर्वव्यापी हैं, और अपने भक्तों पर हमेशा उनकी दृष्टि रहती है। जो उनके चरणों में पूरी तरह से समर्पण कर देता है, गुरूजी उसकी मुश्किलें स्वयं ही आसान कर देते हैं।
मेरा यह सत्संग इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। अक्टूबर, 2010 में मेरे छोटे बेटा, जोकि डाउन सिंड्रोम की समस्या से ग्रसित है, उसे डेंगू हो गया था। वह दशहरे का दिन था। जब हमें उसकी रक्त जाँच की रिपोर्ट मिली उसमें उसकी प्लेटलेट 32000 प्रति माइक्रो लीटर थे, जबकि सामान्य व्यक्ति में इनकी संख्या 2 लाख प्रति माइक्रो लीटर होती है। उसे साकेत में एक अस्पताल में भर्ती किया गया और उसकी हालत बहुत बिगड़ गई थी। उसके मल में रक्त आने लग गया, जिससे उसको आइ सी यू में भर्ती कर दिया गया पर उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी।
तीसरे दिन, चिकित्सकों ने रात को तीन बजे हमें बुलाकर बताया कि उसके शरीर में आंतरिक रक्तस्राव (इंटरनल ब्लीडिंग) शुरू हो गया है और उसका गुर्दा और जिगर भी जवाब दे रहे हैं। जिसका असर उसके दिमाग पर हुआ और उसने लोगों को पहचानना बंद कर दिया था। उसे वापस वेन्टिलेटर पर डाला दिया गया। उसे बचाने का चिकित्सकों ने एक ही रास्ता बताया - लिवर ट्रान्सप्लांट। किन्तु हमारे परिवार में किसी का भी ब्लड ग्रुप मेरे बेटे से नहीं मिलता था। इसलिए चिकित्सकों के साथ साथ हम सबने भी उम्मीद छोड़ दी थी। उसके बचने के कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही थी और चिकित्सक के अनुसार उसकी जिंदगी कुछ ही घंटे बचे थे।
इसी बीच मेरा बड़ा बेटा अपने एक दोस्त के साथ अस्पताल आया, जिसने उसको गुरूजी के बड़े मंदिर चलने को कहा। हमने गुरूजी के बारे में कभी नहीं सुना था और मेरी पत्नी ने बेटे को कहा कि अब जितना भी समय रह गया है, उसे अपने भाई के साथ बिताना चाहिए। साथ ही मेरी पत्नी ने उसको अगले दिन बड़े मंदिर जाने के लिए कहा, किन्तु उसके दोस्त ने दबाव डाला कि उसको उसी दिन जाना चाहिए, बाद में जाने का कोई लाभ नहीं।
मेरे बेटे ने उसकी बात मानकर, मेरी पत्नी से कहा कि उसको अभी ही जाने दे, जिसके लिए मेरी पत्नी भी मान गई। वह बुधवार का दिन था। मेरे बेटे और उसके दोस्त को समाधि के दर्शन हुए किन्तु शेष मंदिर बंद था क्योंकि वहाँ मरम्मत का काम चल रहा था और संगत का भी दिन नहीं था। वे दोनों मंदिर के पीछे की तरफ गए जहाँ उनकी मुलाकात माली भईया से हुई। जिसने उन्हें बताया कि इस समय मंदिर में और कोई नहीं है। मेरे बेटे ने कभी गुरूजी का स्वरूप भी नहीं देखा था, और उसकी इच्छा थी कि उसको गुरूजी के किसी स्वरूप के दर्शन हो जाए। जब उसको लगा कि दर्शन नहीं होंगे तो वह फूट फूट कर रोने लगा।
उसी क्षण एक महिला संगत आईं और उन्होंने मेरे बेटे से उसके रोने का कारण पूछा। उसकी गंभीर परेशानी के बारे में सुन कर वह बोलीं कि सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने मंदिर का एक कमरा खुलवाया और मेरे बेटे से गुरूजी की तस्वीर के आगे माथा टेकने को कहा। फिर उन्होंने दोनों को लडू प्रसाद, समोसा प्रसाद और जल प्रसाद दिया और मेरे बेटे को कहा कि इसको रोगी को खिलाना। जब उनको पता चला कि रोगी वेंटिलेटर पर है तो उन्होंने गुरूजी का स्वरूप दिया और बोला इसको रोगी के तकिये नीचे रख देना। उन्होंने गुरूजी की समाधि से एक फूल भी लेकर मेरे बेटे को दिया।
मंदिर से लौटते हुए मेरे बेटे ने अपने अंदर बहुत ही सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया। अस्पताल पहुँचकर उसने हमें सब कुछ बताया और यह भी कहा कि उसे पूरा विश्वास है कि उसका भाई बच जाएगा। हमने गुरूजी का स्वरूप अपने बेटे के तकिये के नीचे रख दीया। मेरे बेटे को उसी पल एहसास हुआ कि गुरूजी ने हमारी सारी परेशानियाँ अपने सिर ले ली हैं और उसका भाई ठीक हो जाएगा। उसे लगा कि जैसे गुरूजी बोल रहे थे कि अब मैं आ गया हूँ और मैं कुछ गलत नहीं होने दूँगा।
अगली सुबह से ही मेरे बेटे की हालत में सुधार आना शुरू हो गया और एक दिन बाद उसे होश भी आ गया। चिकित्सक आश्चर्यचकित थे और बोले कि यह एक चमत्कार है और उन्होंने पहले कभी किसी को ऐसे में ठीक होते हुए नहीं देखा। तीसरे दिन तक मेरे बेटे ने सामान्य आहार खाना भी शुरू कर दिया। अब वह बिलकुल ठीक है और हमारे साथ नियमित रूप से गुरूजी के आश्रम जाता है।
ऐसे चमत्कार गुरूजी की कृपा से ही हो सकते हैं। यद्यपि, उस दिन मंदिर बंद था, गुरूजी ने हम पर फिर भी अपनी कृपा की जिसका माध्यम मेरे बेटे का दोस्त, मंदिर में मिली आंटी, फूल, प्रसाद और गुरूजी का स्वरुप बने। गुरूजी हर जगह उपस्थित हैं और मंदिर आनेवाले सभी लोगों की परेशानियाँ और उनकी मनोदशा जानते हैं। गुरूजी किसी भी रूप में आकर अपने भक्तों की हमेशा सहायता करते हैं।
मेरे बेटे के ठीक होने के बाद मेरे बेटे ने उन महिला संगत से मिलने की बहुत कोशिश की पर सफल नहीं हो पाया। अन्त में, मार्च 2011 में उसे वह दिखीं और हम सब उनसे मिले। वह पटपड़गंज से दत्ता आंटी थीं। उन्होंने बताया कि वह भी इतने महीनों से उस बच्चे के बारे में सोच रही थीं जो अपने भाई के लिए रोता हुआ मंदिर आया था।
गुरूजी हम सबकी प्रार्थनायें सुनते हैं और जो हमारे लिए सबसे अच्छा होता है, वह करते हैं। हमें यदि कुछ करना है तो बस पूरी श्रद्धा के साथ उन्हें समर्पण।
बी. एन. ऐनड्ली, एक भक्त
जनवरी 2012