"भगवान शिव धरती पर गुरूजी के रूप में आए हैं और आप उनसे एम्पायर एस्टेट में मिल सकते हैं।" मैंने यह शब्द गुरूजी के एक भक्त, श्री गुप्ता से सुने, जोकि हमारे घर आए हुए थे। मैंने एकदम सोचा: भगवान तो हर जगह होते हैं, केवल एम्पायर एस्टेट में ही क्यों? और मैंने निश्चय किया कि मैं वहाँ नहीं जाऊँगी।
जब मैं वहाँ गई तो मेरी शंकाएँ और बढ़ गईं। गुरूजी एक लकड़ी के कैबिनेट पर जूते पहन कर बैठे हुए थे और दो महिलायें उनकी बाज़ूएँ दबा रही थीं। मुझे यह बिलकुल अच्छा नहीं लगा और मैं सोचने लगी कि यह मैं कैसी जगह आ गई हूँ। मैं चुपचाप बैठ गई और जब चाय प्रसाद आया तो मैंने वो नहीं लिया। मुझे गुरूजी के संगत की यह बातें पता नहीं थीं : चाय प्रसाद लेना, शबद कीर्तन सुनना और लंगर करना। मैं बस गुरूजी को और उन दो महिलाओं को देखे जा रही थी और सोच रही थी कि इस बात का कोई विरोध क्यों नहीं कर रहा था और कैसे सब मूर्ख बन रहे थे। मैंने गुरूजी के पास जाकर उनसे बात करने की सोची लेकिन तभी वह उठकर कमरे में अपने कपड़े बदलने के लिए चले गए। फिर वह लौट कर अपनी गद्दी पर आकर बैठ गए। फिर से मैंने जाकर उनसे सवाल करने का सोचा : अगर आप सच में भगवान शिव हैं तो धरती पर इतने जुर्म क्यों होने देते हैं? मैं एक संगत दम्पति, कपिल अंकल और आंटी, के साथ बैठी हुई थी और मैं उनसे बोली कि हमें गुरूजी के पास जाकर उनसे यह पूछना चाहिए। उन्होंने मुझे चुपचाप बैठ जाने को कहा। मैं आग्रह करती रही पर वह नहीं माने। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि सब चुपचाप क्यों बैठे हुए थे। अन्त में मैं उठकर गुरूजी के पास गई।
मैंने गुरूजी से जाकर पूछा, "आप कौन हैं?" उन्होंने जवाब नहीं दिया और इशारे से मुझे चले जाने को कहा। मेरे पास उनसे पूछने के लिए इतने सारे सवाल थे लेकिन वह गुस्से से इशारे करके मुझे जाने को कहते रहे। तब तक लंगर प्रसाद परोसा जाने लगा और एक भक्त, श्री सिंगला, ने मुझे सवाल करना छोड़ कर लंगर करने को कहा। वह भी मुझसे अप्रसन्न थे परन्तु बोले कि गुरूजी पहले से ही मेरे सवाल जानते थे। अब मुझे गुस्सा आ गया था। मैंने क्या अपराध किया था कि गुरूजी और उनके भक्त, दोनों मुझसे गुस्सा थे। मैं रोने लगी और मैंने लंगर करने से मना कर दिया और मेरे पति और दोनों बच्चों ने भी। हम बाहर चले गए जहाँ जूते रखे हुए थे। मैं रोये जा रही थी: मैंने ऐसा क्या कहा या किया था कि सब मुझसे अप्रसन्न थे। और तो और मैंने श्री सिंगला को उन महिला संगत जिनके साथ मैं आई थी, को शिकायत करते सुना कि वह कैसे लोग मंदिर लेकर आ रही थीं और लाने से पहले उनको मंदिर के बारे में क्यों नहीं बताया था।
मैं घर वापस जाते समय सारे रास्ते रोती रही और अपने पति को कहती रही कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया था कि मुझे इतनी डाँट पड़े। मेरे पति मुझे चुप कराते रहे और बोले कि गुरूजी के पास दोबारा जाकर हम अपना समय नष्ट नहीं करेंगे। घर पहुँचकर मेरे पति और बच्चे सो गए लेकिन मेरे मन में अभी भी सवाल था : सारी दुनिया में इतना अधर्म था, इसके बारे में कोई कुछ कर क्यों नहीं रहा था ?
मैं अपने विचारों में खोई हुई थी कि मुझे एक सुगंध आई। मैंने अपने आस-पास देखा कि वह सुगंध कहाँ से आ रही थी पर मुझे कुछ पता नहीं चला। मैंने अपने पति को उठाने की कोशिश की लेकिन वो यह कहकर सो गए कि मेरे रोने से वो परेशान हो गए हैं और उन्हें नींद आ रही थी।
फिर मुझे गुरूजी 'दिखे'। वह मुझे एक जगह ले जा रहे थे जहाँ भगवान शिव और शेषनाग थे। मैंने भगवान शिव की जटाओं से बारिश की बूँदें गिरते हुए देखीं और मैं शान्ति की अनुभूति हुई। मैंने बड़े मंदिर का शिवलिंग भी देखा। फिर गुरूजी ने मुझे कुछ पीने को कहा। मैंने उनसे पूछा कि वह क्या था पर उन्होंने मुझे बस वह पीने को कहा। मैंने वो गुरूजी से और माँगा पर वह बोले कि जितना मैंने पीआ था वह पर्याप्त था, मैं इससे अधिक लूँगी तो दीवानी हो जाऊँगी।
इस घटना के कुछ दिनों बाद तक मेरा पूरा घर सुगंध से भरा रहा और मुझे यह नहीं समझ आ रहा था कि यह सुगंध आ कहाँ से रही थी। मैंने अपने पड़ोसियों के घर जाकर पूछा कि उन्होंने कौनसी अगरबत्ती जलाई थी पर वे बोले कि उन्होंने कोई अगरबत्ती नहीं जलाई थी। ऐसा कुछ दिनों तक चलता रहा। गुरूजी की एक संगत, श्रीमती पुष्करना, को इस बात का पता चला और तो वह मेरे घर आईं। उन्होंने मुझे बताया कि यह गुरूजी की खुशबू थी और उन्होंने मुझे बड़े मंदिर के बारे में भी बताया।
मैंने मंदिर जाना शुरू किया। मैं प्रायः अपने सपने के बारे में सोचती किन्तु मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने क्या देखा था। एक दिन गुरूजी ने एक संगत, जो मलेरकोटला में रहते थे और 'मास्टरजी' के नाम से जाने जाते थे, को बताया कि उन्होंने मुझे दर्शन दिए थे और अमृत पिलाया था। जब मैं बड़े मंदिर गई तो मास्टरजी मुझसे बोले कि गुरूजी मुझे याद कर रहे थे और गुरूजी ने उनको यह सब बताया था। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि मुझे जो सुगंध आ रही थी वह गुरूजी की थी। अब मुझे विश्वास हो गया था कि गुरूजी शिव भगवान थे। हमने हर शनिवार नियमित रूप से गुरूजी के यहाँ जाना शुरू कर दिया।
अस्पताल में गुलाब की पंखुड़ी
मेरी सास बहुत बीमार थीं और अस्पताल में भर्ती थीं। मेरे पति, बच्चे, देवर और मैं उनसे मिलने अस्पताल गए। वह कुछ भी खा या पी नहीं पा रही थीं। मैंने उन्हें गुरूजी का सत्संग सुनना शुरू किया और खाने के लिए सेब दिया जो उन्होंने खा लिया। फिर मैंने उन्हें चीकू दिया और उन्होंने वो भी खा लिया। मैं अपनी सास को बता रही थी कि गुरूजी भगवान हैं और सर्वव्यापी हैं। मेरी सास उदास थीं और मैं उन्हें खुश करने की कोशिश में बार-बार बोल रही थी कि गुरूजी अवश्य हमारे पास आयेंगे। मैंने सेब और चीकू छीले थे और वो छिलके मेरे हाथ में थे और मेरी सास ने मुझे वो कूड़े के डिब्बे में फेंकने के लिए कहा। मैं उनसे बोली कि क्योंकि गुरूजी को आना था इसलिए मैं वह जगह गंदी नहीं करना चाहती थी और मैं छिलके कमरे से बाहर जाकर फेंकूँगी। मेरी सास आग्रह करती रहीं किन्तु मैं भी अड़ी रही कि मुझे जगह गंदी नहीं करनी थी। तभी जहाँ हम बैठे हुए थे, मुझे गुलाब की एक पंखुड़ी दिखाई दी। मैंने वो सबको दिखाई और बोली कि गुरूजी आए थे। सब आश्चर्यचकित थे – एक क्षण पहले वहाँ कुछ नहीं था और अचानक ही गुलाब की एक पंखुड़ी कैसे प्रकट हो गई थी !
मधु गाबा, एक भक्त
अप्रैल 2012