मैं वर्ष 2009 में गुरूजी की जादुई और दिव्य शिवपुरी पहुँचा। हम अप्रैल 2011 में गुड़गाँव सेक्टर-56 के जलवायु टावर्स में रहने आए। हमारे कुछ मित्रों से हमें गुरूजी के बारे में पता चला। यद्यपि, मेरा परिवार बहुत धार्मिक प्रवृत्ति का है किन्तु गुरूजी को अपनाने में हमें कुछ समय लगा। जिसका कारण हमारी अज्ञानता थी। संगत ने हमें सदैव यही बताया कि गुरूजी भगवान हैं, और धीरे-धीरे मेरे पूरे परिवार को गुरूजी में विश्वास हो गया। किन्तु यह समझने में कि गुरूजी सर्वोच्च ईश्वर हैं, हमें कुछ समय लग गया। ऐसा नहीं था कि उनके सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान होने पर हमें कोई शंका थी, हमें केवल इस बात पर विश्वास नहीं हो पा रहा था कि क्या हम इतने भाग्यशाली हैं कि हमें भगवान – जोकि तीनों लोकों के रचियता - (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) हैं, गुरु के रूप में मिले हैं। आज अपनी अज्ञानता के विषय में सोचकर ही हंसी आती है।
गुरूजी की कृपा अनंत है, बस यही सच है। उनके आशीर्वाद के सागर से हम बस एक छोटी सी नदी जितना ही ले पाते हैं, और उनकी कृपा को एक तालाब जितना समझ पाते हैं, और उसका वर्णन बस एक बूँद जितना कर पाते हैं ! और बस वह एक बूँद ही पर्याप्त होती है हमारी प्यास बुझाने के लिए! तनिक सोच कर देखिए, अगर हम उनकी आज्ञानुसार पूर्ण समर्पण कर देते हैं तो वह अनुभूति कैसी होगी? यही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए; स्वयं मेरा भी जीवन लक्ष्य यही है।
हेपेटाइटिस भी परीक्षा की बाधा न बन सका, मेरे गुरूजी ईश्वर तुल्य
मैं राष्ट्रीय प्रौद्यौगिकी संस्थान (एन आई टी), वारंगल से कंप्यूटर विज्ञान और इंजीनियरिंग में प्रौद्योगिकी स्नातक में कर रहा था। दूसरे साल के पहली तिमाही परीक्षा में खराब मौसम और खाने के वजह से मुझे हेपेटाइटिस-ए हो गया। पहले मुझे बुखार हुआ और बहुत चिकित्सकों को दिखाने के बाद भी एक हफ्ते तक वह इस बीमारी की पहचान नहीं कर पाए। मेरा स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था और मुझे दिल्ली वापस आकर गुड़गाँव के एक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। मेरी हेपेटाइटिस की संख्या - 4.0 के आस-पास थी और चिकित्सकों ने मुझे सीमित आहार के साथ, दवाइयाँ और उबला हुआ पानी पीने को कहा, और कम से कम एक महीना आराम करने को कहा।
मैं बहुत दुविधा में था, क्योंकि दस दिनों में मेरी परिक्षाऐं आरंभ होने वाले थी और मेरे विभागाध्यक्ष अनुशासन और नियमों को लेकर बहुत पक्के थे। एक बार मेरी एक मित्र चेचक (चिकन पॉक्स) हो जाने के वजह से पाँच में से एक परीक्षा नहीं दे पाई थी। उसकी उपस्थिति 70 प्रतिशत थी और उसने चिक्तिसा प्रमाण पत्र (मेडिकल सर्टिफिकेट) भी दिया था, फिर भी उसके साथ कोई नर्मी नहीं दिखाई गई थी।
उस समय तक हमने गुरूजी के यहाँ जाना आरंभ कर दिया था। मेरी माँ ने मुझसे कहा कि मुझे सब कुछ गुरूजी पर छोड़ देना चाहिए, किन्तु समर्पण करना इतना आसान भी नहीं था क्योंकि मेरी पढ़ाई मेरे लिए सब कुछ थी।
गुरूजी से आज्ञा लेकर मैं 45 दिन बाद कॉलेज गया। मेरी उपस्थिति 40 प्रतिशत थी और यदि मैं नियमित रूप से कॉलेज जाता रहता तभी वो सेमेस्टर के अन्त तक 65 प्रतिशत तक ही पहुँच सकती थी। अपने साथियों की प्रतिक्रिया देखकर मैं बहुत डर गया। कहीं से प्रोत्साहन ना मिलने पर और मानसिक दबाव के कारण मुझे डिप्रेशन हो गया। हेड ऑफिस जाकर अपना मेडिकल सर्टिफिकेट जमा करने से एकदम पहले मैंने अपनी माँ को फोन किया तो वह बोलीं, "बेटा, बोलो जय गुरूजी"। गुरूजी को याद करके मैं ऑफिस में दाखिल हुआ।
इसके बाद जो हुआ वो किसी चमत्कार से कम नहीं था। जो इंसान स्वभावतः अत्याधिक सख्त था, उसने मेरी परेशानी सुनी और बिना किसी ना नुकुर के, मुझे सारी परीक्षाओं में बैठने के लिए मेरे आवेदनपत्र पर हस्ताक्षर कर दिए, मेरे स्वास्थ्य के बारे में पूछा और सलाह दी कि कैसे मैं छात्रावास में घर जैसा बना खाना खा सकता था। साथ ही, उन्होंने मुझे सुझाव दिए कि किस प्रकार में अन्य प्राध्यापकों (प्रोफेसरों) के साथ अपनी उपस्थिति की समस्या को सुलझा सकता था! मैं एकदम विस्मित रह गया। ऑफिस में अंदर आते समय मैं बहुत डरा हुआ था पर जब मैं बाहर निकला तो मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी। उसी क्षण मैंने गुरूजी को अपने भगवान के रूप में स्वीकार कर लिया।
कहने की आवश्यकता ही नहीं कि जल्द ही गुरूजी ने मेरा हेपेटाइटिस भी ठीक कर दिया। चिकित्सकों को डर था कि मुझे यह बीमारी दोबारा से हो सकती थी, क्योंकि बीमारी ठीक होने के तुरंत बाद से मैं छात्रवास का खाना खा रहा था, और दोबारा होने पर उसे ठीक होने में और एक महीना लग जाता। किन्तु अब मेरे पास मेरे गुरूजी थे। चार दिन बाद मैं अपने घर में था। कम उपस्थिति होने के बावजूद मेरे प्राध्यापको ने मुझे घर जाने के लिए अनुमति दे दी। उन दस दिनों में मैं तीन बार गुरूजी के बड़े मंदिर गया और दो बार मंदिर में सेवा भी की। दस दिन बाद जब मैं कॉलेज वापस गया तो बिलकुल स्वस्थ था।
दबंग छात्र के बदले की योजना गुरूजी ने की विफल
विश्वविद्यालयों में छात्रों को लेकर कोई ना कोई समस्या रहती है और ना चाहते हुए भी मैं ऐसी एक स्तिथि में फंस गया और बात बहुत बिगड़ती चली गई। मेरी कक्षा में एक लड़की के साथ मेरी अच्छी मित्रता थी, जिसका एक पुरूष मित्र कॉलेज का गुंडा था, जिसके राजनीतिक सम्बन्ध भी थे। वह मुझे पसंद नहीं करता था और बार-बार उस लड़की को मुझसे दूर रहने के लिए कहता क्योंकि उसे लगता था कि हम दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे। किन्तु मैंने उसकी धमकियों पर कभी ध्यान नहीं दिया क्योंकि मैं धमकियों के चलते अपनी एक अच्छी दोस्त को खोना नहीं चाहता था। पर मेरा ऐसा सोचना गलत साबित हुआ। यह मेरा पहला अनुभव था जब मैंने ऐसी किसी समस्या का सामना किया था।
एक रात, करीब 11:30 बजे वो लड़का अपने तीन साथियों को लेकर मेरे कमरे में आ गया। उस समय मैं अपने एक मित्र (सुनील) के साथ काम कर रहा था। उन्होंने सुनील को धक्का मार कर कमरे से बाहर निकाल दिया और कमरा अंदर से बंद कर दिया। यह स्पष्ट था कि उनका इरादा मुझे पीटने का था। ऐसे तो मैं भी डील-डौल से ताकतवर हूँ पर पहले कभी मैंने किसी से लड़ाई नहीं की थी। मेरे हृदय की धड़कनें बड़ गई और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। मैं हमेशा गुरूजी का लॉकेट पहनता हूँ और मैंने बस उसको हाथ में पकड़ लिया और बोला, "आपके सहारे, गुरूजी।"
पहले तो वो लोग मुझे गालियाँ देने लगे। उसी समय दरवाज़े पर कोई आया। वह हमारा ही एक मित्र फिरोज़ था। निस्संदेह सुनील सबसे पहले उसके कमरे में गया था क्योंकि वही सबसे पास रहता था। अगले कुछ मिनटों में वे मुझे क्या-क्या बोलते रहे, मुझे कुछ याद नहीं और वो आवश्यक भी नहीं है। पाँच मिनट तक उन्होंने मुझे उस कमरे में बंदी बनाकर रखा और उतने समय में वे मेरे साथ बहुत कुछ कर सकते थे। पर उन्होंने मुझे एक बार भी छूआ तक नहीं और बस चुपचाप कमरे से निकल गए! यह मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं था।
यह घटना एक स्पष्ट उदाहरण है कि जब हम गुरूजी को पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं तो वह कैसे हमारा ध्यान रखते हैं, और हमारे माँगे बिना ही वह हमें बहुत कुछ दे देते हैं। वह हमारा आने वाला कल देख लेते हैं और हमें अनजाने खतरों से सुरक्षित रखते हैं।
वो कठिन समय निकल गया था और मेरे ऊपर कोई आँच नहीं आई, पर बात यहीं खत्म नहीं हुई। मैं जानता था कि असफल हो जाने के कारण वो लड़के गुस्से में होंगे और फिर से ऐसा कुछ करने की अवश्य सोच रहे होंगे। मैं अनुशासनात्मक (डिसिप्लनरी) समिति में शिकायत भी नहीं कर सकता था क्योंकि मेरे कुछ ही मित्रों ने यह सारी घटना देखी थी और मेरे पास उस बात के कोई सबूत भी नहीं था। मैं असमंजस में था पर गुरूजी से कुछ कहने से पहले ही उन्होंने मेरी मदद के लिए रास्ता बना दिया। उस लड़के ने सब के सामने मेरा मज़ाक उड़ाने के उद्देश्य से पूरी घटना का वृत्तांत फेसबुक पर डाल दिया और यह भी लिखा कि उसका इरादा मुझे पीटने का था। जैसे ही मुझे इस बात का पता चला, मैंने तुरंत उस लड़के का प्रोफाइल विवरण और घटना के वृत्तांत को लैपटॉप पर डाल दिया और साथ ही उसका प्रिंट भी ले लिया। फिर मैं छात्र मामलों के प्रभारी के पास अपनी शिकायत लेकर गया और यह देखकर आश्चर्यचकित हुआ कि प्रभारी और कोई नहीं मेरे एक पुराने प्राध्यापक थे जो मुझे पसंद करते थे और एक सप्ताह पहले ही पद्दोन्नति होने पर इस पद पर आए थे। उन्होंने बात को गंभीरता से लेते हुए मेरी शिकायत पंजीकृत की, तुरंत सारी कागज़ी कार्यवाही करके उन तीनों लड़कों को बुलाया। इस बारे में प्रभारी ने छात्र मामलों के अध्यक्ष से भी बात की।
अगले दो घंटों में यह घटना विश्वविद्यालय परिसर का सबसे बड़ा समाचार बन गई थी। गवाही देने के लिए मेरे मित्र भी सामने आये। दबाव डाले जाने पर और डर कर, उन तीनों लड़कों ने प्रभारी के सामने लिखित में सब कुछ स्वीकार कर लिया। दुनिया के स्वामी के अलावा किस में इतनी क्षमता हो सकती है कि इतने कम समय में सारी बात पलट के रख दें? वो हमारे गुरूजी हैं।
इस बारे में मैंने घर में किसी को भी कुछ नहीं बताया था। अगले ही दिन माँ ने मुझसे फोन किया और सीधे पूछा, "क्या हुआ बेटा, तू ठीक तो है ना?" बाद में उन्होनें मुझे बताया कि गुरूजी की किताब पढ़ने के बाद उन्होंने सांकेतिक सपना देखा था जिसमें मुझे एक सफेद, गोल आकार की वस्तु मिली है जिसे मैंने भूमि पर फेंक दिया। वह गोल वस्तु साँप का अंडा था और अनजाने में मैंने उसे मार दिया। मेरी माँ ने सपने में ही एक और सपना देखा जिसमें उन्होंने मुझे सोता हुआ देखा और मैं यह सपना देख रहा था कि साँप की माँ बदला लेने के लिए आई है। मैं जाग गया और मैंने देखा कि वो फुफँकार रही थी और मुझे डसने के लिए तैयार थी। तभी गुरूजी वहाँ आए और उन्होंने उस साँप को प्लास्टिक के लिफाफे में बंद कर दिया। वो मादा साँप छटपटा रही थी और मुझे डसने की कोशिश कर रही थी परन्तु गुरूजी ने उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा हुआ था कि वह कुछ नहीं कर पाई। ऐसे गुरूजी ने मुझे बचाया। सपना देखकर मेरी माँ जाग गई। अब जब मैं इसके बारे में सोचता हूँ तो मुझे एहसास होता है कि दो लोगों के रिश्ते के बीच में आने की मैंने अनजाने में गलती की थी। फिर भी गुरूजी ने मुझे बचा लिया।
बड़े मंदिर का निर्देशित भ्रमण, मेरे मन के मंदिर से
अपने विश्वविद्यालय के अगले सत्र तक मैं गुरूजी और बड़े मंदिर को इतना पसंद करने लगा था कि मैं पूरे समय बस उनको ही याद किया करता था। मैं नियमित गुरूजी का ग्रंथ पढ़ता और गुरूजी के स्वरूप से बातें करता, दक्षिण भारत में पढ़ाई करने के कारण मैं तीन-चार महीनों में ही घर जा पाता था जिससे बड़े मंदिर और समाधि स्थल जाने की मेरी चाह निरंतर बढ़ती ही जा रही थी। मैंने गुरूजी के शारीरिक रूप में कभी दर्शन नहीं किये थे, किन्तु अपने मन के मंदिर में, मैं गुरूजी को बड़े मंदिर के रूप में ही देखता था।
एक रात मैं बहुत उदास था, इसलिए मैंने गुरूजी के पावन ग्रंथ से कुछ सत्संग पढ़ने लगा, यह सोच कर कि शायद उनमें मुझे मेरे प्रश्नों के जवाब मिल जाए और मेरा दुःख दूर हो जाए किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं गुरूजी के स्वरूप को हाथ में पकड़कर रोने लगा और जल्द ही मुझे नींद आ गई।
मैंने एक सपना देखा जिसमें मैं बड़े मंदिर के मुख्य द्वार के सामने खड़ा हूँ। मैंने एक सफेद कमीज़ पहनी हुई थी जो मैंने कभी वारंगल से खरीदी थी और जिसे अभी तक घर नहीं ले गया था। मैंने गुरूजी को अपने पीछे आते हुए देखा किन्तु वह चल नहीं रहे थे बल्कि हवा में उड़ रहे थे। उन्होंने सफेद रंग का सुन्दर चोला पहना हुआ था जिसपर दृष्टि पड़ते ही मन को अपार शांति का अनुभव होता था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, लेकिन न जाने क्यों मैं सपने में भी बिलकुल आश्चर्यचकित नहीं हुआ। गुरूजी मुझे समाधि, मुख्य कक्ष, कुटिया, रसोईघर, बगीचे और मंदिर की हर एक जगह पर लेकर गए और एक-एक जगह के बारे में बताते रहे। करीब एक घंटे बाद वे बोले कि अब वापस जाने का समय हो गया है। हम मुख्य द्वार पर पहुँचे और मैंने उनके चरण कमलों में शीश झुकाया। जब मैंने उठकर उनकी ओर देखा तो वे मुस्कुरा रहे थे और फिर हवा में अंतर्धयान हो गए। वहाँ इतनी रोशनी थी कि ऐसा लग रहा था मानो हज़ारों सूरज एक साथ निकल आए हों। यह सबकुछ बहुत सुखद और शान्तिप्रद था। गुरूजी (मेरे ईश्वर), से इतनी निकटता की मुझे पहले कभी अनुभूति नहीं हुई थी।
गुरूजी सर्वोच्च हैं। वो हमारे लिए जो करते हैं उसके बदले हम उनके लिए कुछ नहीं कर सकते हैं। जो मैंने समझा है, हम अगर उनके लिए कुछ कर सकते हैं तो वो है कि बिना किसी शर्त के उन्हें प्यार करें, हमेशा खुश रहें, उनकी आज्ञा का सदैव पालन करें, औरों के काम आएँ, सेवा करें और अपना मन साफ रखें।
आरंभ में, बड़े मंदिर जाने से पहले मैं सूचि तैयार कर लिया करता था जो मुझे गुरूजी से माँगनी होतीं, पर कुछ माँग नहीं पाता था। फिर मुझे आभास हुआ कि उनसे माँगकर हम अपनी खुशियाँ और आशीर्वाद कम कर लेते हैं जो गुरूजी ने हमारे लिए सोचकर रखी होती हैं। इसलिए हमेशा याद रखना चाहिए : माँगो नहीं, मानो।
गुरूजी से मेरी यही प्रार्थना है कि हम सब सदा उनके चरण कमलों में रहें क्योंकि जैसे कि सारी संगत जानती है, चरणा दी मौज बड़ी। जय गुरूजी!
निशांत राज यादव, एक भक्त
जनवरी 2012