मुझे कुछ समय से गुरूजी के दर्शन नहीं हुए थे और मैं अपनी अन्तरात्मा में उदासी का आभास करती थी। मैंने जब अपनी माँ से पूछा कि गुरूजी मुझे दर्शन क्यों नहीं दे रहे थे तो वह बोलीं कि मुझे ध्यान लगाना चाहिए। अगले दिन हम बड़े मंदिर गए और मैं मुख्य कक्ष (हॉल) में आँखें बंद करके गुरूजी को बोली कि मुझे ध्यान लगाना नहीं आता है और उन्हें ही मुझे यह सिखाना होगा।
तभी मुझे दिव्य दर्शन हुए
मुझे गुरूजी उसी मुद्रा में दिखाई आए जिसमें उनकी बड़े मंदिर में तस्वीर है ‐ वह एक के ऊपर दूसरा हाथ रखे हुए मुस्कुरा रहे हैं। उन्होंने अपना हाथ ऊपर किया और उनकी हथेली से एक हरे रंग की रौशनी की किरण निकली जो संगत को आशीर्वाद देती हुई उन पर बरसी। फिर गुरूजी उसमें से बाहर निकलकर अपने आसन पर जाकर बैठ गए। संगत उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके पास जा रही थी और वे सबके सिर पर हाथ रख रहे थे।
अचानक मंदिर में रखी हुई शिवजी की मूर्ती उठ खड़ी हुई। शिवजी ने अपना त्रिशूल उठाकर धरती में गाड़ दिया। मैं डर गई और मैंने घबराकर गुरूजी से पूछा कि यह क्या हो रहा था। गुरूजी बोले, "यह एक भूकम्प है। बाहर सब लोग मर रहे हैं लेकिन संगत सुरक्षित रहेगी।" मुझे मुख्य कक्ष में सचमुच सारी संगत दिखाई दे रही थी, वह भी जो अन्य दिनों पर मंदिर आती है।
फिर गुरूजी अपने आसन से उठे और उन्होंने मुख्य कक्ष का एक चक्कर लगाया। उन्होंने जो चोला पहना हुआ था वह बदलता जा रहा था। गुरूजी ने हर एक संगत के सिर पर हाथ रखा और फिर उनका चोला वही हो गया जो उन्होंने आरंभ में तस्वीर में पहना हुआ था। फिर वह अपनी तस्वीर में वापस चले गए और मुस्कुराते हुए उसी मुद्रा में बैठ गए।
इसके बाद मेरी उदासी दूर हो गई और मैं सकारात्मक महसूस करने लगी। मुझे अभी भी ध्यान लगाना नहीं आता है लेकिन मैं जानती हूँ कि जब गुरूजी चाहेंगे तब वह मुझे ध्यान लगाना सिखा देंगे। वह मुझे मुझसे अधिक जानते हैं और मैं अगर कुछ कह सकती हूँ तो बस, जय गुरूजी !
प्राची गाबा, एक भक्त
अप्रैल 2012