यद्यपि, यह सच है कि हम सभी न जाने कितने जन्मों से गुरुजी के साथ जुड़े हुए हैं, किन्तु इस जन्म में, मैं गुरुजी से वर्ष 2021 में जुड़ी। यह फरवरी-मार्च की बात है, जब कोविड के समय, मेरे पति की नौकरी चली गई थी। मैं बहुत दुःखी और परेशान होकर हर समय रोती रहती थी। पंजाब, जहाँ कि हमने अपना घर लिया हुआ था, वहाँ कोविड के कारण हम जा नहीं सकते थे, इसलिए हम मेरे ससुराल में ही रह रहे थे। सौभाग्यवश, एक दिन मुझे किसी संगत का सत्संग सुनने को मिला और उसके बाद मुझे बहुत शांति का अनुभव हुआ। जब भी मैं सत्संग सुनती, मेरा मन यह सोचकर शांत हो जाता कि गुरुजी महाराज मेरी प्रार्थनाएँ अवश्य सुनेंगे। मैं गुरुजी के दर्शन के लिए सदैव तरसती रहती थी।
एक दिन अचानक से, मेरे पति ने मुझसे कहा कि हम पंजाब में अपने घर चलते हैं। क्योंकि हम दोनों ही किसी दूसरे पर बोझ बनने के कारण असहज अनुभव कर रहे थे। यद्यपि मैंने बचपन से ही बहुत दुःख देखे हैं, फिर भी मैं ईश्वर से सदैव यही प्रार्थना करती थी कि मुझे कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। जल्द ही हम पंजाब में अपने घर लौट आए। एक शाम मैं सोच रही थी कि क्या कभी मुझे किसी सत्संग में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिलेगा। मैं किसी भी भक्त को नहीं जानती थी, और न ही मेरे पास गुरूजी का कोई स्वरूप था। मैं उनके दर्शन के लिए तरस रही थी। इसके लिए मैंने गुरूजी के स्वरूप ऑनलाइन भी देखे, किन्तु यह सोचकर नहीं लिए कि मैं ईश्वर की कीमत कैसे लगा सकती हूँ। मुझे विश्वास था कि गुरुजी किसी भी तरह मुझे दर्शन अवश्य देंगे। अचानक, मुझे गुलाब जैसी सुगंध आई। मैंने सत्संग में गुरुजी की सुगंध के बारे में सुना था; मुझे पता था कि यह वही हैं। मैं खुशी से रो पड़ी।
कुछ दिनों के पश्चात मेरे पति को उनके एक मित्र ने नौकरी के लिए बताया, जिसके साक्षात्कार के लिए उन्हें दिल्ली जाना था। मैं भी साथ में गयी और वहाँ अपनी छह साल की बेटी के साथ अपने देवर के घर रुकी। मैं यह सोचकर बहुत प्रसन्न थी—कि शायद गुरूजी हमें अपने मंदिर बुला रहे हों। उस समय, मंदिर में दर्शन के लिए ई-पास लेने होते थे। यद्यपि, जब हम वहाँ पहुँचे, तो बड़ा मंदिर बंद था और ई-पास उपलब्ध नहीं थे।
यद्यपि मेरे देवर के घर पर हुई एक घटना से मेरी अभिलाषा थोड़ी सी बढ़ गई कि शायद मुझे गुरूजी के दर्शन हो जाएं। एक दिन मेरे देवर अपने एक मित्र से कुछ बात कर रहे थे तब उन्होंने "कड़ा प्रसाद" बोला। जैसे ही मैंने यह शब्द सुना, मैं उत्सुकता से उनकी ओर दौड़ी। तभी मेरे ससुर जी ने मुझे बताया कि उनके एक दोस्त के घर पर सत्संग का आयोजन हो रहा है। मैं यह जानकर बहुत प्रसन्न हुई और मैंने पूछा कि क्या हमें भी बुलाया गया था? उसके दोस्त ने जवाब दिया कि संगत गुरुजी के कहने पर आती है और हमारा स्वागत था। अगले दिन हम सत्संग में थे। मुझे बहुत ही अच्छा लगा क्योंकि मुझे गुरुजी के दर्शन हुए। वह अपने भक्तों की बात बहुत जल्दी सुनते हैं।
इस बीच, मेरे पति साक्षात्कार के लिए चले गए, किन्तु बात नहीं बनी और हम पंजाब लौट आए। महाराज ने मुझे अपना दर्शन देने के लिए ही दिल्ली बुलाया था। उसके बाद गुरुजी महाराज मुझ पर बहुत कृपालु रहे; उनकी सुगंध मेरे घर में चौबीसों घंटे रहती थी। यह इतनी तीव्र होती थी कि मुझे छींकें आने लगती थी; मुझे गुरुजी से सुगंध को कम करने की विनती करनी पड़ी। उसके बाद से कभी-कभी ही सुगंध आती है। जब भी मैं गुरुजी को याद करती हूँ, तरह-तरह की सुगंध आने लगती हैं। यह एक अलौकिक अनुभव है। बाद में महाराज ने मुझे मेरी आंतरिक ज्ञान चक्षु के माध्यम से अन्य देवताओं के भी दर्शन कराए—भगवान कृष्ण, राधा रानी, साईं बाबा और दसों सिख गुरु।
धन्यवाद, गुरुजी महाराज। मैं आपसे प्रेम करती हूँ!
प्रियंका जायसवाल, एक भक्त
जुलाई 2024