(स्वर्गीय कर्नल चैटर्जी द्वारा कथित)
अक्टूबर 2011 में जब मैं गुड़गॉंव में काम कर रहा था तो राजा जैस्वाल, दूसरे ग्रुप से यहाँ आया हुआ एक उत्क्रिष्ट टेलीकम्युनिकेशन्स मेकैनिक था जो बहुत सारे तकनीकी काम करता था।
उसका कार्यकाल मई 2002 में समाप्त होने वाला था और उसने मुझे मेरे बॉस से उसके लिए निवेदन करने को कहा। मैंने अपने बॉस से उसका कार्यकाल बढ़ाने का अनुरोध किया पर उन्होंने यह कह कर अस्वीकार कर दिया कि मुंबई मुख्यालय पहले ही राजा को अतिरिक्त समय देने के लिए मना कर चुका था। राजा, जो उतावलेपन से उत्तर की प्रतीक्षा में था, शादी-शुदा था और उसका वेतन बहुत ही कम था। उसके लिए यह बुरी सूचना थी। मैंने उससे कहा कि मैं असफल हो गया था और अब बस गुरूजी ही कुछ कर सकते थे।
वह शुक्रवार का दिन था और उसका कॉन्ट्रैक्ट मंगलवार को समाप्त हो रहा था। राजा उसी शनिवार को गुरूजी के पास चला और उसने गुरूजी को अपनी समस्या के बारे में बताया। कुछ समय बाद, लंगर करते समय मैंने उसे रोते हुए देखा। जब मैंने उससे इसका कारण पूछा तो वह बोला कि गुरूजी ने "परे जा" कहकर उसे ज़ोर से डाँट लगाई थी। मैंने उसे समझाया कि गुरूजी सब पर अपरिमित आशीर्वाद बरसाते हैं और उनके यह शब्द एक अप्रत्यक्ष कृपादान थे: गुरूजी ने एक विघातक ग्रह, जो राजा को सड़क पर ले आता, को डाँट लगाई थी। मैंने राजा को लंगर के बाद संगत हॉल से बाहर ना जाने की और वहीं बैठे रहने की सलाह भी दी और उसने ऐसा ही किया।
लंगर करने के बाद जब कुछ ही संगत रह गई थी जब गुरूजी ने राजा को पास बुलाया और बोले, "तेरा काम कर दिया"।
आने वाले सोमवार को मैं अपने बॉस के पास गया और उनसे बोला कि राजा ने बहुत अच्छा काम किया था और उसकी विदाई के लिए हमें उसे चाय की पार्टी देनी चाहिए। बॉस ने मुझे वह ई-मेल देखने को कहा जो उन्होंने मुझे भी भेजा था। मैं अपने कार्यालय गया जहाँ मुझे एक अच्छी खबर मिली: मुंबई से मैनेजिंग डायरेक्टर ने स्वयं मानव संसाधन (ह्यूमन रिसोर्स) के प्रमुख, मेरे बॉस और अन्य अधिकारियों से पूछा था कि राजा को मेरे तहत क्यों नहीं रखा जा सकता था।
गुरूजी के आशीर्वाद से, आज राजा हार्डवेयर ग्रुप की एक महत्त्वपूर्ण संस्था का स्थायी कर्मचारी हो गया है और अच्छा वेतन पाता है।
राजा जैस्वाल, एक भक्त
जुलाई 2011