जे तू ना फड़दा साडी बाँह असां रुल जाना सी
सानु किथे ना मिलदी थां असां मर जाना सी
(अगर आपने हमारा हाथ ना थामा होता, हम भटक जाते;
अगर आपने हमें बचाया ना होता, हम मर जाते)
मुझे समझ नहीं आता है कि मेरे परिवार को सदैव अपना आशीर्वाद देने के लिए मैं गुरूजी का धन्यवाद कैसे करूँ। जबसे हम गुरूजी की दिव्य छत्र-छाया में आये हैं, जीवन जीने लायक हो गया है। गुरूजी हमारे रास्ते की बाधाएँ और तनाव को दूर हटाकर हमारे जीवन को सरल बना देते हैं। वह जानते हैं कि हमें कब किस वस्तु की आवश्यकता है। बिन बोलिया सब किछ जांदा (बिना बोले ही वे सबकुछ जानते हैं) - और हमारी इच्छाएँ पूरी करते हैं।
4 अक्टूबर 2010 को, केवल 6 महीने और 5 दिन की गर्भावस्था के बाद, मैंने नई दिल्ली के एक अस्पताल में एक कन्या को जन्म दिया। समय से पहले जन्म होने की वजह से नवजात बच्ची को नवजात शिशु गहन देखभाल इकाई (एन. आइ. सी. यू.) में भर्ती किया गया। चिकित्सकों ने हमें साफ-साफ कह दिया था कि बच्ची के बचने के आसार बहुत कम हैं क्योंकि उसका जन्म समय से बहुत पहले हुआ है। हमने चिकित्सकों से कहा कि वे अपनी ओर से बच्ची को बचाने के प्रयास में कोई कमी न रखें। वो एन. आइ. सी. यू. में 40 दिन से लगातार वेन्टीलेटर के सहारे थी।
मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे गुरूजी की तस्वीर दी थी और यद्यपि अब तक मैंने गुरूजी को पूरी तरह से समर्पण नहीं किया था, मैं जब भी एन. आइ. सी. यू. में जाती तो अपनी बच्ची के बिस्तर पर वह तस्वीर रखती ताकि उसको गुरूजी का आशीर्वाद मिल सके। मेरे मामा और मामी (मग्गो अंकल और आंटी) ने मुझे गुरूजी की दिव्य शक्तियों के बारे में बताया और मैंने उन पर विश्वास करना आरंभ कर दिया। किन्तु अभी भी मेरी बेटी एन. आइ. सी. यू. में ही भर्ती थी। चिकित्सकों ने भी अब उम्मीद छोड़ दी थी और मैं बहुत रो रही थी। तब एक दिन मेरे मामा और मामी हमारे घर आए और उन्होंने मुझे गुरूजी के सत्संग की किताब और शबद की सी. डी. दी। उस दिन से मैंने सत्संग पढ़ने और शबद सुनने आरम्भ किये। मेरी बेटी की हालत बिगड़ती जा रही थी और चिकित्सकों ने अब हमें तैयार रहने के लिए कह दिया था पर मुझे अभी भी उम्मीद थी कि शायद कोई चमत्कार होगा और मेरी बेटी बच जाएगी।
किन्तु जब मेरी बेटी नहीं रही मैं पूरी तरह से टूट गई। वह 11 नवम्बर 2010 का दिन था और मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी दुनिया ही खत्म हो गई। परन्तु गुरूजी ने मुझे और मेरे परिवार को सहारा दिया और इस दुःख से उबरने में हमारी मदद की।
गुरूजी के आशीर्वाद से जनवरी 2011 में मैं दोबारा गर्भवती हुई। मैंने अपने मन में बस एक ही भाव कायम रखा : कि गुरूजी ने मुझे आशीर्वाद दिया है और वो मेरे बच्चे का ध्यान रखेंगे। एक बच्चे की तरह मैंने उनको पूरी तरह से समर्पण कर दिया और मुझे पूर्ण विश्वास था कि गुरूजी मुझे एक स्वस्थ बच्चे का आशीर्वाद देंगे। यद्यपि मेरी गर्भावस्था में कुछ परेशानियाँ आईं, और पूर्व प्रसव के कारण चिन्ताएँ भी थीं, पर मेरी गर्भावस्था आराम से निकली। चिकित्सकों ने हमें कहा था कि इस बार खतरा अधिक था पर हमें गुरूजी में पूरा विश्वास था।
अपनी गर्भावस्था के सातवें महीने में मुझे एक भक्त का सपना आया। वह महिला अपने बच्चों, एक लड़का और लड़की, के साथ हमारे घर आई थी और उसने अपना एक बच्चा मुझे रखने के लिए कहा। मैं लड़की के साथ खेल रही थी। मेरा पहला बच्चा लड़की थी और मैं उसे वापस पाना चाहती थी। पर वो आंटी मुझे लड़का रखने के लिए कह रही थी और बोली, "इसे रख लो यह भी गुरूजी का बच्चा है।" मैं लड़की रखने की हठ कर रही थी और और साथ ही यह भी सोच रही थी कि मैं तो पहले से ही गर्भवती हूँ, इस बच्चे का ध्यान मैं कैसे रखूँगी।
मुझे सपने का मतलब उस समय समझ नहीं आया पर जब 6 सितम्बर 2011 को मुझे गुरूजी के आशीर्वाद स्वरूप एक प्यारी पुत्री हुई तो मतलब स्पष्ट था कि कैसे सपने में ही गुरूजी ने मुझे आशीर्वाद दिया और मेरी इच्छा पूरी की।
हमने अपना पहला बच्चा खो दिया था, इसलिए इस बार हमने बहुत सोचकर दूसरा अस्पताल चुना। 6 सितम्बर 2011 को मैं घर पर थी जब मुझे प्रसव पीड़ा शुरू हुई और जब मैंने अपने चिकित्सक को फोन किया तो उसने कहा कि उस समय वह उसी अस्पताल में थी जहाँ मैंने अपना पहला बच्चा खोया था और उसने मुझे शांत होने को और तुरंत वहीं आने के लिए कहा। जब तक मैंने अपने पति को यह बताया, वह गाज़ियाबाद पहुँच गए थे और घर वापस आने में उनको एक घंटा लग गया। जब तक वह घर पहुँचे मैं शबद सुनती रही और गुरूजी से प्रार्थना करती रही कि वह मेरे बच्चे का ध्यान रखें।
अस्पताल जाते समय गुरूजी ने हमें अपनी उपस्थिति का एहसास कराया। हमारे आगे वाली गाड़ी पर एक बड़ा सा ॐ लिखा हुआ था और इससे हमें आश्वासन मिला कि हम सुरक्षित थे। हम जानते थे कि मैं और मेरा बच्चा गुरूजी की शरण में थे। अस्पताल पहुँचने पर डॉक्टर ने मुझे उसी समय भर्ती होने को कहा क्योंकि किसी दूसरे अस्पताल जाने का हमारे पास समय नहीं था। आधे घंटे के अंदर मेरा प्रसव (डिलीवरी) सामान्य हुआ और गुरूजी से मुझे एक स्वस्थ बच्चे का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। बच्ची के माथे पर त्रिशूल, गुरूजी का चिन्ह, बना हुआ था।
यह बात भी मुझे बाद में समझ आई कि मैं उसी अस्पताल क्यों गई : क्योंकि पहले मैं हर बार यही प्रार्थना करती थी कि मैं इसी अस्पताल से एक स्वस्थ बच्चा घर लेकर जाऊँ। गुरूजी ने मेरी प्रार्थना स्वीकार करके मेरी इच्छा पूरी की।
दो दिन बाद हम जाँच के लिए दोबारा अस्पताल गए। चिकित्सक ने मेरी बेटी की बिलिरुबिन की जाँच करवाई जिसकी मात्रा अधिक थी। फोटोथेरेपी इलाज के लिए मेरी बेटी को दो दिनों के लिए नर्सरी में भर्ती किया गया। मैं अपनी बेटी को लेकर चिंतित थी पर गुरूजी में मेरा पूर्ण विश्वास था। अपने बेटी के बिस्तर पर गुरूजी की तस्वीर रखकर मैं घर वापस गई। उसके साथ वाले बिस्तर पर एक और बच्चे का वही इलाज चल रहा था।
मेरी बेटी शनिवार को भर्ती हुई थी और वो बच्चा रविवार को। सोमवार को हमें अस्पताल से फोन आया कि हम अपनी बच्ची को वापस ले जा सकते थे; उसकी रिपोर्ट अब ठीक थी! शाम को जब हम अपनी बच्ची को घर ले जाने के लिए पहुँचे तो हमने देखा कि वो दूसरा बच्चा भी उसी दिन और उसी समय घर वापस जा रहा था। गुरूजी ने दोनों बच्चों पर कृपा की थी।
सही मायने में, हमारी बेटी गुरूजी का आशीर्वाद है इसलिए हमने उसका नाम मेहर (गुरूजी की कृपा) रखा है। उसके माथे पर त्रिशूल का निशान अभी भी स्पष्ट रूप से नज़र आता है और जब भी हम बड़े मंदिर जाते हैं तो वह और अधिक चमकता है। हमें आशीर्वाद देने के लिए गुरूजी का धन्यवाद।
जय गुरूजी !
रिया रावल, एक भक्त
जनवरी 2012