मुझे कुछ मित्रों और परिवार के सदस्यों से गुरुजी के बारे में पता चला। पर मैंने कभी भी उनसे मिलने की कोशिश नहीं की। मेरे विचार से जब गुरुजी की इच्छा हो तभी हम उनको जान सकते हैं। फिर ऐसा हुआ कि हमारे परिवार के एक सदस्य ने हमें एक ई-मेल भेजा यह बताते हुए कि उनका सत्संग गुरुजी की वेबसाइट पर डाला गया था। मैंने उसका सत्संग पढ़ा तो मैं विस्मित होकर आगे और पढ़ने लगी। मेरे अंदर गुरुजी के लिए श्रद्धा जगी और मैं जानने लगी कि उनके पास दिव्य शक्ति है। किन्तु उनमें मेरी सच्ची श्रद्धा कुछ महीनों बाद विकसित हुई।
मैं अपनी 16 माह की बेटी के साथ अमेरिका से भारत जा रही थी। मेरी बेटी पहली बार हवाई जहाज़ में सफर कर रही थी और 16 घंटों की उड़ान के बारे में सोच कर मैं घबरा रही थी। उसके लिए हवाई जहाज़ पर सीट नहीं थी, जिसका मतलब था कि 16 घंटे उसे मेरी गोद में ही बैठना था। मैं शौचालय कैसे जाऊँगी, यह सोच कर मैं बहुत घबरा रही थी; क्या होगा अगर वह सारा समय रोती रही? मैं इतना छोटा बच्चा और सामान कैसे सम्भालूँगी?
फ्लाइट पर चढ़ने से पहले मैंने कर्मचारियों से हवाई जहाज़ में कोई सीट खाली होने के बारे में पूछा ताकि मेरी बेटी को भी सीट मिल जाए पर उन्होंने कहा कि फ्लाइट पूरी भरी होने के कारण कोई सीट खाली नहीं थी। इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं थी क्योंकि इससे पहले भी जब मैंने एयरलाइन में फोन करके पूछा था तो मुझे यही जवाब मिला था। मैं हवाई जहाज़ में चढ़ी और गलियारे के साथ वाली सीट पर दो और महिलाओं के साथ बैठ गई। मैं अपने पति को फोन करके बता ही रही थी कि हम बैठ गए थे और फ्लाइट बस उड़ने ही वाली थी कि अचानक मेरे साथ बैठी हुई लड़की उठी और आगे वाली सीट पर जाकर बैठ गई। यह सब फ्लाइट अटेन्डेन्ट को बिना मेरे कुछ बोले हुआ और इतनी जल्दी हुआ कि मुझे कुछ पता ही नहीं चला कि कैसे हुआ। जब सारी फ्लाइट भरी हुई थी तो एक सीट खाली कैसे हो गई? यह गुरुजी का आशीर्वाद था। उनकी दृष्टि हम पर थी। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि भारत से वापस जाते समय भी मुझे साथ वाली सीट खाली मिली। मेरी बेटी की भारत की पहली यात्रा पर गुरुजी ने मुझे और मेरी बेटी को आशीर्वाद दिया।
उनकी कृपा कम्प्यूटर पर भी
एक और घटना घटी जब मेरी कम्पनी का कम्प्यूटर मुझे एक एरर मैसेज दे रहा था। काम पर मैं समाचार सम्बन्धित वेबसाइट्स देख रही थी जिसके कारण इंटरनेट द्वारा कम्प्यूटर में वायरस आ गया। मेरे कम्प्यूटर ने काम करना बंद कर दिया और मैं बहुत डर गई क्योंकि अब मुझे हेल्प डेस्क की सहायता लेनी पड़ती। ऐसा करने पर उन्हें पता चल जाता कि मैं इंटरनेट पर थी जो कम्पनी के नियमों के विरुद्ध था और इस बात पर मेरी नौकरी भी जा सकती थी। कम्प्यूटर बंद करके मैं घर चली गई, यह सोचते हुए कि हो सकता था कि अगले दिन तक वायरस चला जाए। अगले दिन जब मैं काम पर गई तो वायरस अभी भी था। अब मैं बहुत डरी हुई थी। मैंने एक बार फिर कम्प्यूटर बंद किया पर इससे भी कुछ नहीं हुआ। फिर मैंने बहुत ज़ोर लगाते हुए गुरुजी से प्रार्थना की और अपने पर्स में से गुरुजी के चरण कमलों की तस्वीर वाला बुकमार्क निकाला और उसे अपने कम्प्यूटर पर रख दिया। एक अंतिम कोशिश करते हुए मैंने अपना कम्प्यूटर बंद किया और दोबारा चलाया - और जादू की तरह वह बिलकुल ठीक चल रहा था। एक बार फिर, गुरुजी की कृपा और उनका आशीर्वाद।
मैं पूरे मन से गुरुजी के आशीर्वाद के लिए और जब भी मुझे उनकी आवश्यकता पड़ी है, मेरे साथ होने के लिए उनका धन्यवाद करती हूँ।
रूपिका वधावन, एक भक्त
जुलाई 2011