गुरूजी मेरे पथदर्शक

सरबरी सेन, अप्रैल 2012 English
जय गुरूजी !

यह लिखते हुए कि कैसे परमप्रिय गुरूजी ने मुझे आशीर्वाद दिया, मेरी आँखें भर आ रही हैं।

मार्च 2010 में जब मैं एक नियमित स्वास्थ्य जाँच के लिए गई तो मेरे लिए परेशानियों का समय आरंभ हो गया। जाँच के परिणाम में मुझे स्तन का कैंसर से ग्रस्त पाया गया। तदोपरांत भी मेरी विभिन्न प्रकार स्वास्थ्य जाँच हुई जिनके परिणाम ने उपरोक्त बात की पुष्टि की। यद्यपि मैं स्वस्थ दिखती थी, जिससे मेरे चिक्तिसक बहुत चकित थे। किन्तु सच्चाई इसके विपरीत थी, मेरी बिमारी तीव्र गति से बढ़ती जा रही थी।

मैं सदैव अनुशासित जीवन जीती रही, साथ ही अपने आहार और दिनचर्या का भी बहुत ध्यान रखने के कारण मेरी सेहतअच्छी थी। उस समय मेरी आयु 48 वर्ष थी और मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मुझ पर कोई पहाड़ टूट गया हो। मेरी शल्य चिक्तिसा (ऑपरेशन) हुई, तत्पश्चात बहुत दुष्कर रसायन चिक्तिसा (कीमोथेरेपी) हुई और तदोपरांत मेरी विकिरण चिक्तिसा (रेडिएशन) आरंभ हुई, और उसी समय मुझे गुरूजी का बुलावा आया।

16 अगस्त 2010 को मैं और मेरे पति बड़े मंदिर पहुँचे। कीमोथेरेपी के कारण मेरे दाँत टूटने लगे थे। मेरे दंत चिक्तिसक ने ही मुझे गुरूजी के बारे में, और बड़े मंदिर पहुँचने का मार्ग भी बताया। जब हम मंदिर पहुँचकर हाथ जोड़े समाधि की परिक्रमा कर रहे थे तो एक वृद्ध महिला जो मेरे आगे थीं, रुकीं, और उन्होंने पीछे मुड़कर मुझसे पूछा, "क्या तुम ठीक हो?"

उन दिनों मुझे बहुत शर्मिंदगी का आभास होता था क्योंकि मेरे सिर पर बाल नहीं थे और ना ही पलकें व भौहें थीं। मैं सदैव सिर ढक कर रहती थी। उन महिला का प्रश्न सुनकर मैं सहम गई और गुस्सा होकर बोली, "अब मैं ठीक हूँ!" उन्होंने मुझे अपने साथ समाधि के बाहर आने को कहा। मुझे और मेरे पति दोनों को लगा कि मेरी बिमारी के कारण वह हमें समाधि से बाहर निकाल रही हैं। मेरे पति तुरंत मुझे बाहर लेकर गए। वह महिला हमें अपने साथ अपनी गाड़ी तक लेकर गईं और उन्होंने हमें एक किताब दी - 'लाइट आफॅ डिविनिटी'।

मैं स्तब्ध होकर बस पुस्तक को देखती जा रही थी। तब मेरे पति ने मुझे उनसे को कहा कि उस किताब के लिए हमें कितने पैसे देने थे। गुरूजी के भेजे हुए उस महिला रूपी दूत ने हाथ जोड़कर मुझसे कहा कि वह तो बस सेवा कर रही थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि गुरूजी ने तुम्हें अपनी शरण में ले लिया है और फिर उन्होंने मुझे गुरूजी का एक स्वरूप भी दिया।

अपने उपचार कराते हुए मैं प्रतिदिन उस ग्रंथ को पढ़ती ,किन्तु मुझे इस बात से परेशानी होती कि सभी सत्संग उन भक्तों के थे जिन्होंने गुरूजी को शारीरिक रूप में देखा था। मुझे लगा शायद मैं बहुत अभागी और अयोग्य हूँ कि गुरूजी ने अपना शरीर रूपी चोला छोड़ देने के बाद मुझे अपनी शरण में लिया था।

मैं बड़े मंदिर हर सोमवार और अन्य दिन भी लंगर प्रसाद के लिए जाने लगी। मेरा उपचार 26 मई 2011 तक चला और मेरी सेहत, ताकत और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) में निरंतर सुधार आता रहा। हर परिक्षण के परिणाम यही होते कि इतनी दुष्कर कीमोथेरेपी के बाद भी मेरे आंतरिक अंग एक सामान्य व्यक्ति से श्रेष्ठतर काम कर रहे थे।

उसी समय मेरी हड्डियों की जाँच हुई और उसके परिणाम भी ठीक आए। चिक्तिसकों ने मेरा कीमो पोर्ट (एक छोटा उपकरण जो जिसके माध्यम से रसायन चिकित्सा दी जाती है), भी निकाला दिया। दो सालों के बाद अब मुझे समस्त पीड़ाओं से छुटकारा मिला गया है। यह बुरा समय बहुत लम्बा चला परन्तु गुरूजी ने मुझे इससे बाहर निकाला।

नारियल का अप्रभाव

बचपन से ही मुझे किसी भी रूप में नारियल से असहनीयता (एलर्जी) रही है। अगर मैं सिर में नारियल का तेल भी लगा लेती तो मुझे तुरंत फफोले हो जाते। मुझे नारियल से बहुत डर लगता था और मैं बहुत सावधान रहती थी क्योंकि चिकित्सक ने मुझे कहा था कि नारियल मेरे लिए जानलेवा भी हो सकता था।

सोमवार की एक दोपहर मैं बड़े मंदिर गई और चाय और समोसा प्रसाद लेने के लिए कतार में थी। लेकिन मुझे चाय प्रसाद के साथ दो खांडवी और एक लड्डू मिला। मैं बस उस खांडवी को देखती जा रही थी जिस पर घिसा हुआ नारियल डला हुआ था। मैं गुरूजी के प्रसाद को ना कैसे कर सकती थी और मैं उसे खा भी कैसे सकती थी? मैं एक मिनट तक बस उस खांडवी को देखती रही और फिर हिम्मत जुटाकर "जय गुरूजी" बोली और उसे खा गई। घर जाते समय मैंने अपने पति को फोन करके कहा कि शायद मुझे अस्पताल जाना पड़े क्योंकि मैंने दो खांडवी खाई थी। मेरे पति बोले कि हम दो घंटे इंतज़ार करके देखेंगे। दो घंटे बीत गए, फिर बीस घंटे और फिर दो सौ घंटे परन्तु मुझे कुछ नहीं हुआ। आज तक, बड़ा मंदिर ही वो जगह है जहाँ मैं बिना किसी चिंता के नारियल खा सकती हूँ।

दुःख...कृपा में परिवर्तित

जिस समय मैं कैंसर से लड़ रही थी, मेरी बेटी की सगाई हो चुकी थी और जनवरी 2011 में उसकी शादी तय थी। गुरूजी की शरण में आए हमें बस एक महीना हुआ था और लड़के के परिवार वाले हमारे साथ बुरा व्यवहार करने लगे थे। 5 सितम्बर को मेरी 6 घंटे लम्बी कीमोथेरेपी होने वाली थी और उससे एक दिन पहले हमारी बेटी की सगाई टूट गई। हमारा परिवार पूरी तरह से टूट गया और अगले दिन अपनी कीमोथेरेपी को लेकर भी मैं बहुत तनाव में थी। ऐसा लग रहा था जैसे हमारी सारी दुनिया खत्म हो गई थी और हम बस एक अँधेरी गुफा में चले जा रहे थे जहाँ रोशनी की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही थी। मेरे पति बोले : "हमारे दुःखों का कोई अंत ही नहीं है।" हमारे मित्र और रिश्तेदार हमारे दुर्भाग्य को लेकर तरह-तरह की बातें बनाने लगे थे। हमें मेरी बीमारी और बेटी की टूटी सगाई से उभारना था और हमने गुरूजी से हिम्मत माँगी।

सदैव अपार प्रेम देने वाले गुरूजी ने ही हमें उस बुरी परिस्थिति से निकाला और एक साल बाद, फरवरी 2012 में हमारी बेटी का विवाह भी हो गया। सच कहूँ तो, मेरी बेटी और उसके पति को सामंन्जस्य बिठाने में कुछ कठिनाइयां आ रही हैं किन्तु हम जानते हैं कि गुरूजी उसकी परीक्षा लेकर उसको निखार रहे हैं और सब ठीक है।

मेरी गुरूजी से यही विनती है कि वह सदा हमें अपने चरण-कमलों में रखें और अंत तक हमारे साथ रहें। वह भगवान हैं, मालिक हैं। वह जो कह दें, वो होकर ही रहता है।

सरबरी सेन, एक भक्त

अप्रैल 2012