उनके बच्चों के साथ कुछ अशुभ नहीं हो सकता है

शैली जैन, जुलाई 2011 English
अक्टूबर 2010 में एक सहेली की शादी में भाग लेने के लिए मैं अपने बेटे और बेटी के साथ कोलकाता से दिल्ली आई थी। मैं अपने दोस्तों, पारुल और राजीव सखूजा से मिली और पारुल मुझे गुरुजी के आश्रम लेकर चली।

आश्रम जाते समय पारुल ने मुझे गुरुजी और उनके चमत्कारों के बारे में बताया। मैं विस्मित होकर सुन रही थी। आश्रम में मुझे बहुत शान्ति और सकारत्मकता की अनुभूति हुई। हमें समोसा और लड्डू प्रसाद भी मिले। कोलकाता पहुँचकर मैंने बहुत उमंग से अपने पति को इस अनुभव के बारे में बताया–वह अपने काम के कारण कोलकाता में ही रुके थे। हम लोग जैन हैं पर सत्संग सुनकर वो भी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझसे कुछ सवाल भी किए और यह स्पष्ट था कि गुरुजी से मिलने के लिए वह भी उत्सुक थे। यह सच है कि जीवन की नैय्या पार लगाने के लिए हम सबको एक गुरु की आवश्यकता होती है।

हमारी रुचि को गुरुजी ने जल्द ही स्वीकारा और उनसे जुड़ने का हमें मौका दिया। अपनी सालगिराह (19 दिसम्बर 2010) पर पारुल और राजीव ने सत्संग रखा और हमें भी उसमें निमंत्रण दिया। हम सत्संग में गए। पहली बार मेरे पति और मैंने स्वयं संगत से सुना कैसे गुरुजी ने उनका जीवन सुधारा था। गुरुजी ने एक जादुई जिन्न की तरह सबकी इच्छाएँ पूरी कीं और उनके दुःख और बीमारियाँ दूर कीं। हमें भावपूर्ण भजन सुनने का भी आनंद मिला। यह एक अद्भुत अनुभव था। उस सत्संग के बाद से मार्च 2011 तक हम हर दो महीने में दिल्ली आए।

उसी समय हमने एक बड़ी एस यू वी खरीदी। हमने यह गाड़ी खरीदने के बारे में सोचा नहीं था, और गाड़ी को लेकर मेरी और मेरे पति के बीच में कई बार बात हुई थी। गाड़ी खरीदते समय हमने सब कुछ गुरुजी पर छोड़ दिया।

गुरुजी जानते थे कि हमारे भाग्य में क्या लिखा हुआ था और उन्होंने हमारे लिए रास्ता निकाला। 13 मई 2011, शुक्रवार के दिन, मेरे पति, हमारा चार साल का बेटा, मेरी दो भतीजियाँ और मैं इसी गाड़ी में घूमने गए और दोपहर में करीब 12 - 12:30 बजे घर लौट रहे थे। उसके बाद जो हुआ वो सोचकर मैं आज भी डर से काँप जाती हूँ। मेरे पति गाड़ी चला रहे थे और गति अवरोध के वजह से उन्होंने गाड़ी की रफ्तार कम कर दी। उनके ऐसा करते ही, एक 50 टन और 20 पहिये वाले ट्रेलर ने हमें पीछे से टक्कर मारी–करीब 10 बार।

वो बड़ी एस यू वी चूर-चूर हो गई। गाड़ी के एयरबैग नहीं खुले। मेरे पति बेहोश हो गए। सब कुछ बहुत भयानक था। सदमे के बाद मुझे आभास हुआ कि हम सब जीवित थे। गुरुजी ने सब कुछ संभाल लिया था। गाड़ी की हालत देखने के बाद किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि हम सब जीवित थे। वो बड़ी गाड़ी रद्दी हो गई थी पर गुरुजी ने हम सबका जीवन बचाया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनके बच्चों को कुछ ना हो: अगर उन्होंने हमें यह गाड़ी ना खरीदवाई होती तो आज हम जीवित न होते।

मेरे प्यारे गुरुजी को मेरा धन्यवाद। और मेरे दोस्तों पारुल और राजीव को भी जिन्होंने हमारा गुरुजी से परिचय करवाया। मैं सदा गुरुजी से उनका आशीर्वाद माँगती हूँ। अब मैं गुरुजी के एक सुंदर भजन से अपना सत्संग समाप्त करना चाहूँगी: गुरुजी पल पल तुझे संभालें काहे मन चिन्ता करे।

शैली जैन, एक भक्त

जुलाई 2011