मैं अपने घर के पीछे एक उद्यान में खेलने जाता थाजहाँ पर मेरे सारे दोस्त अपनी साइकिलें लेकर आते थे, किन्तु मेरी माँ मुझे कभी भी साइकिल लेकर नहीं जाने देती थी, क्योंकि उन्हें डर था कि जैसे पहले हमारी कई साइकिलें घर से चोरी हो चुकी थी, यह भी चोरी हो जायेगी। मुझे बहुत शर्मिंदगी का आभास होता है जब साइकिल होते हुए भी मुझे उद्यान तक पैदल जाना पड़ता था।
एक दिन मैं अपनी नयी लाल रंग की साइकिल लेकर उद्यान गया जहाँ मेरे दोस्त क्रिकेट खेल रहे थे। खेल समाप्त होने के बाद, स्वभाविक मैं पैदल ही घर चला आया और अपनी साइकिल वहीं भूल आया। अगली सुबह जब मैं स्कूल के लिए तैयार हुआ तब मुझे अपनी साइकिल का स्मरण हुआ क्योंकि मैं विद्यालय उसी से जाता था। मुझे पहले ही देर हो चुकी थी इसलिए मेरे पास समय नहीं था कि मैं उद्यान से अपनी साइकिल लेकर जाऊँ। मेरे पिता ने मुझे विद्यालय छोड़ा और बाद में मेरे माता-पिता मेरी साइकिल ढूँढ़ने गए किन्तु वो वहाँ नहीं मिली।
विद्यालय के बाद जब मैं घर आया तब माँ ने मुझे बताया कि पिता मुझसे बहुत क्रोधित थे क्योंकि मैंने अपनी नयी साइकिल खो दी थी और मुझे उसके बारे में पूछताछ करने को कहा। मैंने माँ से कहा, "चिंता मत करो, गुरूजी हैं ना। हमें साइकिल वापस मिल जाएगी।" परन्तु अपनी माँ की बात रखने के लिए, मैंने उद्यान के आसपास के सभी घरों में जाकर पूछाताछ की किन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकला। थक कर मैं उद्यान के कोने में जाकर बैठ गया।
कुछ देर में मेरे चचेरे भाई का एक मित्र आया। सामान्यतः मैं उससे बात नहीं करता हूँ, किन्तु मैंने उससे अपनी साइकिल के बारे में पूछा तो उसने मुझसे मेरी साइकिल के रंग के बारे में पूछा। उससे ही मुझे ज्ञात हुआ कि पिछली रात उसके एक पड़ोसी – जिसे कि सारे बच्चे हिटलर बुलाते थे क्योंकि वो बच्चों की गेंद नहीं लौटाता था – ने एक साइकिल के बारे में पूछा था जोकि उसे उद्यान के पास मिली थी।
वह पड़ोसी रात के खाने के बाद जब सैर पर निकला तो उसे एक साइकिल मिली थी और उसने वो अपने घर पर रख ली थी। मैं उसी समय उनके घर गया और अपनी साइकिल लेकर आया।
गुरूजी के अतिरिक्त और कौन थे जो मेरी साइकिल वापस दिला सकते थे? गुरूजी ने मेरा विश्वास टूटने नहीं दिया और मुझे मेरे पिता के गुस्से और शायद दंड से भी बचा लिया। और सबसे बड़ी बात यह कि मुझे मेरी नयी साइकिल खो जाने के दुःख से भी बचाया।
यह इसलिए हुआ क्योंकि अब हम गुरूजी की शरण में हैं। उद्यान में बिना ताले के रखी हुई साइकिल पर भी उनकी निगाह होती है, वैसे ही जैसे हम सब उनके संरक्षण में हैं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। अगर आपको गुरूजी में विश्वास है, तो आप हमेशा उनको अपने साथ पायेंगे। धन्यवाद, गुरूजी।
समर्थ अहूजा, एक भक्त
मई 2012