1997 की शिवरात्रि से हम गुरूजी के भक्त बने। परन्तु मुझे यह बात कुछ वर्षों बाद समझ आई कि अगर हमें गुरूजी में सच्चा विश्वास है तो हमें चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हाल ही में मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जिससे मेरा विश्वास और दृढ़ हो गया।
बारहवीं कक्षा की परीक्षा में मेरे अच्छे अंक आये थे और मैंने कई अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) प्रवेश परीक्षाएँ दीं। मैंने अखिल भारतीय अभियांत्रिकी प्रवेश परीक्षा (ए आइ ई ई ई) भी दी। घर पर जब मैंने अपने लिखे गये उत्तरों से हिसाब लगाया तो मैं डर गया क्योंकि अच्छे विश्वविद्धयालयों का पिछले वर्ष के जो न्यूनतम अंक (कट-ऑफ) थे, उससे मेरे अंक बहुत कम बन रहे थे और मुझे लगा कि अच्छे विश्वविद्धयालयों में प्रवेश लेने का मेरा सपना अब पूरा नहीं होगा। मुझे प्रतीत हुआ कि जैसे अब मैं अपने जीवन का लक्ष्य कभी हासिल नहीं कर पाऊँगा ,और मैं पूरी तरह से टूट गया।
किन्तु मैं यह भूल गया था कि गुरूजी मेरे साथ हैं और वह अपने बच्चों को कभी दुःखी नहीं होने देते हैं। हमें अगर कुछ करना होता है तो बस ईमानदारी से किया गया प्रयास और उनमें पूर्ण विश्वास।
कुछ ही दिनों में वेल्लोर प्रौद्योगिकी संस्थान (वी आई आई टी) का परिणाम आया जो एक प्रतिष्ठित विश्ववविद्धयालय है, और मेरी अखिल भारतीय श्रेणी (ए आइ आर) इतनी थी कि मुझे अपने इच्छानुसार पाठ्यक्रम में आसानी से दाखिला मिल सकता था। मेरे माता-पिता और मैं आश्वस्त हो गए कि इस श्रेणी के फलस्वरूप मुझे चंडीगढ़ के एक सरकारी विश्वविद्धयालय में भी अवश्य दाखिला मिल जाएगा। चंडीगढ़ क्षेत्र के न्यूनतम अंकों का मानक उस बार नीचे गिर गया और हम जानते थे कि इसके पीछे किन का हाथ था!
मेरे माता-पिता और विशेष रूप से मेरे दादा-दादी इस बात से बहुत प्रसंन्न थे कि अब मैं चंडीगढ़ में ही पढ़ाई कर सकता था और मुझे तमिल नाडु जैसी दूर जगह जाने की आवश्यकता नहीं होगी। पहली परामर्श प्रक्रिया (काउंसलिंग) में मुझे चंडीगढ़ के एक सरकारी विश्वविद्धयालय में अंतिम सीट मिली; मुझे अच्छा लगा परन्तु मैं संतुष्ट नहीं था। मैं ऐसी जगह पढ़ाई नहीं करना चाहता था जहाँ केवल परीक्षा और अंक ही महत्वपूर्ण हों। उस समय मेरी माँ को सपने में गुरूजी के दर्शन हुए और उन्होंने बताया कि मैं पंजाब विश्वविद्धयालय में पढ़ाई कर रहा हूँ।
मेरी अंतिम परामर्श प्रक्रिया में वही हुआ जो गुरूजी का आदेश था : पंजाब विश्वविद्धयालय में मुझे रसायनिक अभियंत्रिकी विभाग (केमिकल इंजीनियरिंग) में प्रवेश मिला। उस साल अखिल भारतय न्यूनतम अंक मानक 12000 श्रेणी तक गिरा – केवल मेरे लिए; वो इतना ना तो इससे पहले कभी गिरा था और ना ही इसके बाद कभी गिरा। यह गुरूजी के अतिरिक्त और कौन कर सकता था? अब मैं रसायन विज्ञान में स्नातक के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा हूँ। और मेरी पढा़ई बहुत अच्छी चल रही है।
मेरी श्रद्धा मुझसे यही कहती है: गुरूजी नु मन के मन्नो ना कि मंग के मन्नो। गुरूजी में श्रद्धा का मापदंड गुरूजी द्वारा हमारी इच्छाओं की पूर्ति नहीं होना चाहिए, अपितु हम उनके बताये मार्ग का कैसे अनुपालन करते हैं यह होना चाहिए। गुरूजी ईश्वर हैं और ईश्वर गुरूजी हैं। जय गुरूजी।
सुक्रात चोपड़ा, एक भक्त
अप्रैल 2012