मुझे गुरूजी के विषय में मार्च 2009 में ज्ञात हुआ, जब मेरे पिता के चचेरे भाई और उनकी पत्नी उनसे मिलने के लिए आए। जोकि 2005 से कर्क रोग (कैंसर) से पीड़ित थे। वह अपने साथ गुरूजी का पावन ग्रंथ, ' लाइट ऑफ डिविनिटी' लेकर आए थे। उनके जाने के बाद मेरी माँ मेरे कमरे में आईं और बातों ही बातों में उन्होंने मुझे वो पावन ग्रंथ दिया। उन दिनों मैं पढ़ने के लिए कोई नयी पुस्तक ढूँढ़ रहा था। परन्तु मुझे तब यह नहीं ज्ञात था कि यह कोई सामान्य पुस्तक नहीं थी अपितु एक दिव्य ग्रंथ था, जिसे स्वयं गुरूजी की प्रेरणा स्वरूप लिखा गया था।
कुछ दिन उस ग्रंथ को पढ़ने के बाद मुझे गुरूजी से जुड़ाव का आभास होने लगा। मैंने कभी भी धर्म और सम्प्रदाय का अनुसरण नहीं किया ; बचपन से ही मेरा यह मानना था कि भगवान एक है और हम सब उसके बच्चे हैं। किन्तु, जितना मुझे ज्ञात है, मैं शिवजी की पूजा और ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करता आया हूँ।
गुरूजी से मेरा पहला सचेत जुड़ाव स्वप्न में हुआ: मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैं पैरिस किसी काम के सिलसिले में गया और मैं एक धूसर (ग्रे) रंग के महल के सामने खड़ा था। जब मैंने एक आवाज़ सुनी, 'तैनू आना ते पयेगा' (तुझे आना तो पड़ेगा)। मुझे सपने में गुरूजी की उपस्थिति का आभास हुआ पर इन शब्दों का मतलब मुझे तब समझ में नहीं आया और ना ही यह पता चला कि यह किसने कहे।
मैं "लाइट ऑफ डिविनिटी" पढ़ता रहा, मुझे बार-बार सपने आते जिसमें गुरूजी मुझे बुलाते रहे। वह हर बार बोलते 'तैनू आना ते पयेगा'। इन सपनों को अपने मन का वहम समझकर मैंने इन पर कभी ध्यान नहीं दिया। किन्तु 2009 में मई से लेकर जुलाई तक, मैं जो कुछ भी करता, वो हर बात मुझे गुरूजी की ओर ही लेकर जाती।
जून 2009 के अन्त में मैं काम से छुट्टी लेकर जलंधर गया। मैंने कॉलेज के एक दोस्त के साथ रहने का और फिर एक दिन स्वर्ण मंदिर (गोल्डन टेम्पल) के दर्शन के लिए अमृतसर जाने का कार्यक्रम बनाया। जलंधर से स्वर्ण मंदिर जाते समय मैंने अपने दोस्त को अपने सपनों के बारे में बताया। जलंधर से अमृतसर गाड़ी में 1.5 घंटा लगता है पर मेरे अनुभवों के बारे में सुनते हुए हमें समय का पता ही नहीं चला। और इससे पहले कि हम कुछ समझ पाते, हम एक अजीब सी सड़क पर थे और ऐसा लग रहा था जैसे हमें गाड़ी में बस 40 मिनट ही लगे थे। जब हमने रास्ता पता लगाने की कोशिश की तो पता चला कि हम किसी अनजान रास्ते से स्वर्ण मंदिर पहुँच गए थे। हमें यही लगा कि वो कोई लघु पथ (शॉर्टकट) होगा जो अमृतसर शहर से होकर नहीं जाता। दर्शन करने के बाद जब हमने जलंधर वापस जाने के लिए वही रास्ता ढूँढ़ा तो हमें वो नहीं मिला, और हम सामान्य रास्ते से ही वापस आ गए किन्तु इस बार हमें 1.5 घंटे से अधिक समय लगा।
जलंधर पहुँचकर मैंने अपने दोस्त की माँ को यह सारी घटना बताई। उन्होंने मुझे जलंधर में गुरूजी के घर (जो अब मंदिर है) के बारे में बताया और गुरूजी ने जो उन पर कृपा की थी उसके बारे में भी: जब मेरा दोस्त छोटा था तो उसके चेहरे की एक नस उभरी हुई थी जो गुरूजी ने ठीक की थी। उसी शाम को, हम नहीं जानते थे कि यह गुरूजी का आदेश था, मैं जलंधर मंदिर में था। हमने वहाँ चाय प्रसाद ग्रहण किया। गुरूजी के जन्मदिन समारोह की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं और मंदिर में सफेदी का काम चल रहा था।
दिल्ली वापस पहुँचकर, 7 जुलाई की शाम को मैं और मेरी महिला मित्र (जोकि मेरे साथ जलंधर और मंदिर भी गई थी) और कुछ दोस्तों के साथ सिलेक्ट सिटीवॉक मॉल गए। हम यह देख कर बहुत विस्मित हुए कि गुरूजी के जन्मदिन के अवसर पर उस मॉल में एक बड़े समारोह का आयोजन किया गया था। हम जिस समय मॉल पहुँचे तो समारोह बस समाप्त ही हो रहा था। मेरी महिला मित्र आगे देखने गई कि क्या हो रहा था तो उसे जाने-माने फोटोग्राफर रघु राय द्वारा खींची गईं गुरूजी की तस्वीरें मिलीं। तब से गुरूजी मेरे घर में पूजा के कमरे में विराजमान हैं और मेरा सारा परिवार उनके सरंक्षण में है।
उसी महीने मैं अपनी एक मित्र से मिला जो इंग्लैंड से आई थी और मैंने उसे सारे सत्संग बताये। वह मुस्कुराई : और कहा कि जिन गुरूजी के बारे में, मैं उसे बता रहा था, यह वही हैं जिन्होंने उसे लंदन के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश दिलाया था। उसने आग्रहपूर्वक कहा कि मुझे बड़े मंदिर अवश्य जाना चाहिए।
अगले कुछ महीने, मुझे और मेरी महिला मित्र को हर राह गुरूजी की ओर लेकर जाती रही। मेरी महिला मित्र को सपने में गुरूजी के दर्शन हुए और उन्होंने कहा, "कल्याण हो"! यहाँ तक कि हर जगह – चाहे वो दुकान हो या फिर किसी दोस्त का घर – गुरूजी की तस्वीर के रूप में उनकी उपस्थिती का आभास होता।
जब हम बड़े मंदिर गए तो वहाँ भी मुझे सर्वशक्तिमान गुरूजी की उपस्थिति का आभास हुआ। मुझे अनुभूति हुई कि मैं कितना भाग्यशाली था और मैंने गुरूजी से प्रार्थना की कि जीवन के सफर में वे सदैव मेरा मार्गदर्शन करें। मैंने अपने पिता के स्वास्थ्य और हम सबके कल्याण के लिए भी प्रार्थना की। यद्धपि मैं यह बात भी स्वीकारता हूँ कि अभी भी मेरे मन में कई सवाल थे : ऐसा कैसे होता है कि ईश्वर स्वंय धरती पर आते है और कैसे चुनते हैं कि किसको आशीर्वाद दें? क्यों एक विशेष पथ ही उन तक पहुँचा सकता है? भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए क्या सिर्फ अच्छे कर्म करना ही काफी नहीं होता है? इत्यादि।
नवम्बर 2009 में मुझे लिवर की एक असाधारण बीमारी हुई। जिसका कारण शायद मेरे काम का अत्यधिक बोझ और अत्यंत व्यस्त जीवनशैली था। दुर्भाग्यवश उस समय मैं बड़े मंदिर नहीं जा पाया और एक महीने बाद - 15 दिसम्बर को अपने जन्मदिन के पर, आधी रात को मैं बड़े मंदिर में गया।
कुछ महीने ऐसे ही व्यतीत हो गए और मेरे स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं आया ; चिकितसकों को मेरी बीमारी समझ ही नहीं आ रही थी। सितम्बर 2010 में मुझे गुरूजी और बड़े मंदिर से सम्बंधित एक बहुत बुरा सपना आया। मैंने कुछ इतना भयानक देखा कि आज तक मैं उसके बारे में किसी को बता नहीं पाया हूँ। मैं कई दिनों तक परेशान रहा और मुझे लगा जैसे गुरूजी से मेरा जुड़ाव भी कमज़ोर हो गया था।
मेरी सेहत बिगड़ती गई और अब चिकितसकों को लग रहा था कि मुझे स्वप्रतिरक्षित (ऑटोइम्यून) हेपेटाइटिस (जिगर का रोग) हो गया था। और उन्होंने मुझे जिगर की बायोप्सी कराने को कहा। यद्यपि गुरूजी में मेरा विश्वास डगमगा गया था, परन्तु उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि मुझे बायोप्सी नहीं करानी पड़े। और मेरे जिगर रोग का स्तर भी नकारात्मक (नेगेटिव) आया।
साल 2011 के शुरू से लेकर अंत तक गुरूजी मुझे अपनी दिव्य उपस्थिति का आभास देते रहे। जैसा कि 2009 में हुआ था, ठीक उसी प्रकार साल 2011 में भी हर राह मुझे गुरूजी की ओर ही लेकर जाती थी। मैं गुरूजी की वेबसाइट पर डाले गए सारे शबद सुनता और गुरूजी से प्रार्थना करता। उनका आशीर्वाद माँगता कि वह मेरे विश्वास को बनाये रखें और मेरा मार्गदर्शन करें।
इससे कुछ समय पूर्व मैं दोबारा बड़े मंदिर गया। तब मुझे गुरूजी के शब्दों, 'तेनु आना ते पयेगा' का मतलब समझ आया।
गुरूजी ने मुझे सपने में दर्शन भी दिए, मेरे आस-पास कोई दुष्ट शक्ति थी जिसके सामने मैं लाचार खड़ा था और तभी गुरूजी आकाश मार्ग से प्रकट हुए। उन्होंने एक वज्रपात लिया और उससे उस दुष्ट शक्ति पर वार कर, मुझे बचा लिया।
अब मैं जहाँ भी जाता हूँ मुझे गुरूजी की उपस्थिति का आभास होता है। दिवाली पर मैं अपने पिता के कार्यालय में गुरूजी की पूजा कर रहा था, जब एक बाबाजी जो हर दिवाली पर हमारे यहाँ आते हैं, आये और बोले, "हमारे गुरूजी का आदेश है कि तू बहुत तरक्की करेगा।" मेरे साथ ऐसी अनगिनत घटनाएँ हुई हैं।
यह सारे अनुभव जो मैंने सुने हैं या मेरे साथ हुए हैं, उससे भी बड़ी बात यह हुई है कि अब मेरी अंतरात्मा को पूरी तरह से गुरूजी के साथ जुड़ाव का आभास होता है और मुझे यह समझ आ गया है कि गुरूजी की दृष्टि हमेशा हम सभी पर रहती है और हम उनके संरक्षण में हैं। ईश्वर इस दुनिया में गुरूजी के रूप में हमारा मार्गदर्शन और रक्षा करने के लिए और इस दुनिया को सुखद बनाने के लिए आए हैं। गुरूजी महान हैं और उनके तरीके हमारी समझ से परे हैं। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि वे तब भी हमारी रक्षा करते हैं जब हम जानते भी नहीं हैं कि वह सर्वोच्च शक्तिशाली हैं। वह सही समय पर हमें दर्शन देते हैं और जीवन के सफर को सुगम बनाते हैं। यदि कभी हम उनमें अपनी श्रद्धा खो भी देते हैं या हमारा विश्वास डगमगा जाता है, तब भी वह अपना निश्छल प्रेम हम पर न्यौछावर करते हैं और अपने प्रेम रूपी पथ पर वापस हमारा मार्गदर्शन करते हैं। गुरूजी सर्वव्यापी और सदा दयालु हैं। जैसे मैं बचपन में ईश्वर से उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करता था, आज भी वही करता हूँ और ॐ नमः शिवाय गुरूजी सदा सहाय जपता हूँ। जय गुरूजी !
सुमेहेर बजाज, एक भक्त
अप्रैल 2012